गुरुवार, 15 सितंबर 2016

अंतिम संस्कार के लिए भीड़ ने जुटाए 12 हजार रुपये


मानवता को शर्मसार करने वाले खबरों से समाचार संसाधन भरे पढ़े है। इन्हीं संसाधनों पर इंसानियत की जीती जागती मिसालें आजकल कम ही देखने को मिलती है। लेकिन गुजरात के राजकोट में जो कुछ हुआ वह इंसानियत के नाते किसी मिसाल से कम नही है।
गुजरात के राजकोट के दाहोद के मजदुर परिवार के 11 साल के बेटे की किसी कारण वश मौत हो गई। परिवार मजदूर था और आर्थिक तंगी के कारण उनके पास डेड बॉडी ले जाने के पैसे भी नहीं थे। परिवार के लोग करीब 12 घंटे लाश लेकर डिपो में बैठे रहे। पैसे के जुगाड़ की जुग्गत में लगे परिवार को हर ओर निराशा ही मिली। तभी यह बात जब ड्राइवरों और परिवहन कर्मचारियों को पता चली तो उन्होंने चंदा इकट्ठा करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते ड्राइवरों ने 12 हजार रुपये का चंदा एकत्रित करके मजदूर परिवार को दे दिया। इसके बाद परिवार को लाश लेकर रवाना किया गया, तब जाकर बालक का अंतिम संस्कार हुआ। बताया जाता है कि कुछ कर्मचारी को बच्चे का अंतिम संस्कार कराने के लिए शमशान घाट तक भी पहुंचें। बस डिपो के कर्मचारियों ने मानवता का उत्तम उदाहरण पेश करके यह दिखा दिया कि आज भी देश में इंसानियत जिंदा है। सलाम इन ड्राइवरों व कर्मचारियों को।

बुधवार, 14 सितंबर 2016

मेट्रिमोनियल साइट्स इस्तेमाल करते समय बरतें सावधानी

कहते है जोडियां ऊपर वाला बनाता है मगर बदलते दौर में मेट्रिमोनियल साइट्स जिंदगी के इस नए रिश्तें की बुनियाद रखने में बहुत हद तक कामयाब हो चुकी है। अब अधिकांश रिश्तें मोट्रिमोनियल साइट्स बना रही है। इससे मेट्रिमोनियल साइट्स का कारोबार भी लगातार बढता जा रहा है साथ ही इन साइट्स के बढ़ते प्रचलन के कारण इनका दुरूपयोग भी बड़े स्तर पर किया जा रहा है। पेश है एक रिपोर्ट:-

एक दशक पहले तक चिर-परिचित के माध्यम से ही शादी के लिए रिश्ते ढ़ूंढे जाते थे। अकसर रिश्ते ढुंढने में खासा वक्त बित जाता था। ऐसे में आपने लोगों को यह भी कहते हुए सुना होगा कि जिसके नसीब में जो होगा और जब होगा, उसे वही मिलेगा। बदलते दौर में जहां हर चीज हाईटेक होती जा रही है, वही शादी के लिए रिश्ते ढूंढना भी अब एक व्यवसाय बन चुका है। जी हां, मेट्रिमोनियल साइट्स से तो आप परिचित होगें ही। इन्ही मेट्रिमोनियल साइट्स पर अब रिश्ते चंद घंटों में मिलने संभव हो गये है।

कैसे काम करती है ये मेट्रीमोनियल साइट्स

मेट्रीमोनियल साइट्स पर सबसे पहले खुद को रजिस्टर्ड करना होता है। रजिस्टर्ड करने के बाद आपको अपने बारें में बेसिक जानकारियां देनी होगी, इससे आपकी आईडी बन जाएगी। आईडी बनते ही आपको आपना एक पासवर्ड भरना होगा। भविष्य में आप इसी आईडी के माध्यम से अपने पार्टनर ढूंढ सकते हैं। पार्टनर ढूंढने के बाद यदि आप उनसे सम्पर्क करना चाहते हैं तो आपको इसके लिए वेबसाइट की सदस्यता लेनी होगी। विभिन्न वेबसाइट्स में अलग अलग सदस्यता शुल्क लिया जाता है। आमतौर पर,मेट्रीमोनियल साइट्स तीन तरह की सदस्यता देते हैँ जिन्हें गोल्डन, डायमंड और प्लेटिनम मेंबरशिप कहां जाता है। इन मेंबरशिप के अलग अलग शुल्क निर्धारित किया गया है। साथ ही इनकी वैधता भी अलग अलग है। जैसे गोल्डन मेंबरशिप में 1500 से 2000 रूपये तक देने होते है,इसकी वैधता तीन माह की होती है साथ ही इसमें आप लगभग 500 लोगों की पर्सनल डिटेल्स जान सकते हैं। डायमंड मेंबरशिप में वैधता 6 माह और प्लेटिनम मेंबरशिप में वैधता एक साल दी जाती है।

रिश्ते ढूंढने के लिए अब ओर भी विकल्प है

1)न्यूजपेपर और मैग्जीन्स-अखबार में भी इश्तेहार देकर आप रिश्तें ढूंढ सकते हैं। अखबार में एक पेज क्लासीफाइडस का दिया जाता है। जिनमें बहुत कम रेट पर आपका विज्ञापन प्रकाशित किया जाता है।

2)मैरिज ब्यूरो-छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक में अब मैरिज ब्यूरों खुल चुके है। यहां सदस्यता शुल्क जमा कराकर आप खुद को रजिस्टर्ड कर सकते हैं। यहां मैरिज ब्यूरो आपके लिए रिश्ते ढूंढेगा। आपको रिश्ता पक्का होने पर कुछ शुल्क भी देना होता है। गरीब कन्याओं का विवाह भी कई मैरिज ब्यूरो अपने खर्चे पर कराते हैं।

कुछ फेमस मेट्रीमोनियल साइट्स

www.jeevansathi.com

www.shaadi.com

www.simplymarry.com

www.bharatmatrimony.com

www.communitymatrimony.com

रिश्ता जोडने से पहले यह बाते जरूर जांच लें

-कोई क्रिमिनल केस तो नही है

-समाज में परिवार की कैसी छवि है

-फैमिली बैंकग्राउंड संबंधी जानकारी जरूर करें

-मेडिकल फिटनेस की भी जांच करें

-परिवार के सभी लोगों के बारे में जानकारी करें

-आय के स्त्रोत की जांच भी आवश्यक है

-अगर हो सकें तो, पढाई संबंधी डिग्रियों की जांच भी करें

-आसपड़ोस में भी परिवार के बारें में पूछताछ कर लें


बढ़ रहें है धोखे भी

मेट्रीमोनियल साइट्स के प्रचलन के साथ साथ यहां धोखे भी बढ़ रहे हैं। कुछ मामलों में सामने आया है कि मेट्रीमोनियल साइट्स पर लोग अपना अतीत को छुपा लेते हैं, जैसे पहले से की गई शादी,तलाक या फिर पहली शादी से हुए बच्चें। शादी के बाद ऐसी बातें पता चलने पर स्थिति ज्यादा विकराल रूप धारण कर लेती है। अक्सर तलाक तक की नौबत आ जाती है। इसलिए जरूरी है कि साइट्स से प्रोफाइल डिटेल्स लेने के बाद आप अपने स्तर से जांच पड़ताल कर लें। ताकि बाद में कोई परेशानी ना हो।

एनआरआई के मामले में बरते सावधानी

एनआरआई दुल्हों के धोखाधड़ी के मामले ज्यादा प्रकाश में आए है। एनआरआई दुल्हें या तो शादी के बाद लड़की को विदेश नही ले जाते या फिर विदेश ले जाकर वापस भारत नही आते। ऐसे में लड़की भी विदेश में कैद होकर रह जाती है। वही भारतीय परिवेश में पली-बड़ी लड़की विदेशी सांस्कृति में खुद को ढ़ालने में असहाय महसूस करती है। इसलिए पहले से ही जांच पड़ताल कर लें कि जहां आप अपनी लड़की का रिश्ते करने जा रहे है क्या वह भारतीय संस्कृति को महत्ता देते है या नही। इसके अलावा भी एनआरआई के साथ कई दिक्कतें आती है। यदि एनआरआई संबंधी कोई शिकायत पुलिस में की जाती है तो मामला विदेश से जुडा होने के कारण पुलिस भी देरी से हाथ डालती है। एनआरआई से रिश्ता जोड़ने से पहले विशेष सावधानियां बरते और पहले से ही सारी जांच पड़ताल कर ले ताकि बाद में कोई समस्या उत्पन्न ना हो। एनआरआई के संबंध में विदेश मंत्रालय में जाकर भी आप तहकीकात कर सकते हैं।

डिटेक्टिव एंजेसियों की भी ले सकते है मदद

आजकल जासूसी करने के लिए डिटेक्टिव एंजेसियां सक्रिय है। यदि आप किसी के बारे में गहनता से जांचना चाहते हैं तो आप इन एजेंसियों की सहायता ले सकते हैं। यहां आपको इस काम के लिए फीस देनी होगी और एक निर्धारित अवधि के बाद आपको संबंधित व्यक्ति का पूरा चिट्ठा मिल जाएगा। दिल्ली स्थित बीएमडी डिटेक्टिव एंजेसी के मालिक पंकज सरोहा बताते है कि उनके पास शादी से पहले कई लोग लड़के या लड़की के बारे में जानकारी लेने के लिए आते हैं। हम उन्हें सभी जानकारियां उपलब्ध करा देते हैं जैसे-पहले कोई शादी हुई है या नही, कोई अपराधिक मामला है या नही, किसी बुरी लत का आदी है या नही आदि के अलावा परिवार की पूरी जानकारी।

एक ट्रांसजेंडर की कहानी, उन्हीं की जुबानी: मनाबी बंदोपाध्याय (manabi bandhopadhyay)


बेशक भारत में कानूनन तौर पर थर्ड जेंडर को मान्यता मिल गई हो मगर भारतीय समाज ने अभी तक भी तीसरे लिंग वर्ग (थर्ड जेंडर) को पूरी तरह स्वीकार नही किया है। आज भी थर्ड जेंडर को समाज में तिरस्कार, हीन भावना और अपमान की नजरों से देखा जाता है। ये कहना है देश की पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल बनी मनाबी बंदोपाध्याय का। जिन्होंने विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में अपने संघर्ष के बुते यह मुकाम हासिल किया। अपने लगभग 35 साल के संघर्ष से समाज को आइना दिखाते हुए मनाबी आज सभी के लिए एक मिशाल है। वर्तमान में मनाबी पश्चिम बंगाल के कृष्णा महिला कॉलेज में बतौर प्रिंसिपल कार्यरत है।

ट्रांसजेंडर होने के कारण कई बार मनाबी के सामने इतनी विकट चुनौतियां आई कि आत्महत्या तक की बात दिमाग में छाने लगती, मगर वह हिम्मत के साथ डटती, चुनौती का सामना करती और उसके बाद फिर एक नई चुनौती सामने खड़ी मिलती। 35 सालों तक यही चलता रहा। मंजिल का पता नही था, संघर्ष चरम पर था। लगभग 35 सालों के बाद अब मनाबी को पश्चिम बंगाल के कृष्णा महिला कॉलेज का प्रिंसिपल बनाया गया तो उन्हें लगा कि अब जाकर उन्हें समाज में एक सम्मानजनक स्थान मिला। अपने संघर्ष की दास्तां शेयर कर रही है मनाबी-

शरीर पुरुष का था, इसमें मेरी क्या गलती
मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के नैहाटी कस्बे में 25 सिंतबर 1964 को पुत्र के रुप में हुआ था, लेकिन जैसे-जैसे में 5-6 साल की हुई तो मुझे लड़कियों के कपड़े पहनना अच्छा लगने लगा। मेरा नाम भी सोमनाथ था। स्कूल में भी मैं लड़कियों के खेल खेलना पसंद करती थी। घर में मेरे अलावा दो बहनें ओर थी। मुझे बहनों के कपड़े पहनने का मन होता, मगर मां डांट देती, फिर भी मैं छिपकर उनके कपड़े पहन लेती, कपड़े पहनकर मेरी आत्मा तृप्त-सी हो जाती। मैं खुद को पूर्ण महसूस करती थी। मगर परिवार वालों को यह रास नही आता। कई बार पिताजी ने मेरी पिटाई भी की। मुझे हमेशा लगता कि मैं लड़का नही लड़की हूं और लड़का होने का बोझ ढ़ो रही हूँ। कई बार तो इतना परेशान हो जाती कि मन करता इन सबको छोड़कर कही दूर भाग जाऊं।

स्कूल में बच्चें बनाते थे मजाक
जब मैं स्कूल में पढ़ती थी तो कोई मुझसे दोस्ती नही करता था, किसी दिन यदि मैं स्कूल नही जाती तो कोई मुझे बीते दिन की पढ़ाई के बारे में नही बताता था। यही से मुझे एक सकारात्मक ऊर्जा भी मिली और मैंने आश्रित होना छोड़ दिया, दूसरे बच्चों से पूछना छोड़ दिया। यदि स्कूल नही भी जाती तो भी खुद ही पढ़ाई करती, इसका परिणाम यह हुआ कि मैं कक्षा में अव्वल आने लगी। ग्रेजुएशन में दाखिला लेने पर भी मेरा मजाक बनाया गया। एक बार तो मुझे मेरे सहपाठियो द्वारा कमरे में बंद तक कर दिया गया। अब तक भी मैं घुंट-घुंट कर जी रही थी क्योंकि पोशाक मुझे लड़कों की पहननी होती थी जोकि मुझे बिल्कुल भी पंसद नही था। मेरी व्यवहार शैली देखकर छात्र मेरा मजाक बनाते। लेकिन मुझमें तबतक सहनशक्ति विकसित हो चुकी थी और मैं हर तिरस्कार को अपना मुकद्दर समझकर भूल जाती। मैंने जाधवपुर विश्वविद्यालय से एमए में टॉप किया था। उसके बाद 2006 में थर्ड जेंडर पर पीएचडी की।

2003 में ऑपरेशन के बाद पूरी हुई मुराद
1995 में कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया था। तभी मैंने अपना सेक्स चेंज कराने की ठान ली थी क्योंकि जो अपमान मैं इतने समय से ढ़ो रही थी, मुझे लगता था कि सेक्स चेंज कराने के बाद मुझे इससे छुटकारा मिल जाएगा। इसी दौरान मैंने अकेलापन दूर करने के लिए ट्रांसजेंडरों के लिए पहली मैगजीन 'ओब-मानबनिकाली थी जिसका हिन्दी मतलब था- उप मानव। सेक्स चेंज कराने के लिए ऑपरेशन में 5-6 लाख रुपये लगते थे। जोकि मैंने 2003 तक इकट्ठे कर लिए और उसके बाद अपना ऑपरेशन कराया। ऑपरेशन के बाद लगा कि मेरा वजूद पूरा हो गया हैं। मगर सामाजिक तौर पर मुझे तब भी नही स्वीकारा गया। जेंडर चेंज करवाने के बाद उन्हेंन मारा-पीटा गयारेप तक करने की कोशिश की गई, उनके अपार्टमेंट को आग तक लगा दी गई, लेकिन मैंने हार नही मानी और अपना नाम सोमनाथ से मनाबी (मनाबी का अर्थ है मानवता) रख दिया।

ट्रांसजेंडरों को नही करने देते स्ट्रग्ल
स्ट्रग्ल तो सभी करते हैं, मगर ट्रांसजेंडरों को समाज में एक बड़ा तबका स्ट्रग्ल नही करने देता। मेरे साथ भी यही हुआ। मुझे आज तक समझ नही आया कि समाज में हम जैसे लोगों के प्रति इतना गुस्सा क्यों रहता है? हर जगह पक्षपात का शिकार होना पड़ता है। लेकिन मैंने हार नही मानी, स्ट्रग्ल किया और आज इस मुकाम पर पहुंची। पहले मैं झारग्राम कॉलेज में बतौर प्रोफेसर नौकरी करती थी। वहां मुझे हटाने के लिए अन्य शिक्षकों द्वारा खूब षडयंत्र रचे गए। मुझे वहां के स्टाफ क्वार्टर से निकाल दिया गया। तब मैंने किराये का कमरा लेकर बच्चों को पढ़ाया। लेकिन वहां भी मुझ पर हमले कराए गए। लेकिन मैंने हार नही मानी और उसके बाद विवेकानंद सतोवार्षिकी महाविद्यालय बतौर एसोसिएट प्रोफेसर ज्वाइन कर लिया। लेकिन यहां भी मुझे शिक्षिकों और शिक्षिकाओं के तिरस्कार का सामना अब तक करना पड़ता है। कई बार तो शिक्षिकों के व्यवहार से मैं इतना टूट जाती कि खाली समय में आंसू निकल पड़ते, मैंने उनसे पूछा भी मैं ऐसी हूं तो इसमें मेरी क्या गलती? मगर उनका व्यवहार आज तक भी मेरे प्रति कभी नरम नही हुआ। कॉलेज के स्टाफ में अभी तक भी कोई मुझसे ढंग से बात नही करता था। मेरे स्टूडेंट बहुत अच्छे, वो मुझे बहुत रेस्पेक्ट देते हैं। मैं ट्रांसजेंडर हूं, इसलिए मेरे साथ कॉलेज में एडमिनिस्ट्रेशन लेवल पर भी भेदभाव हुआ। मैंने 2006 में पीएचडी की, उसके बाद 2011 तक मुझे कोई इंक्रीमेंट नही दिया गया। लेकिन मैंने हार नही मानी।

शादी की मगर नही हुई सफल
मैने शादी की तो लगा कि अब सब कुछ ठीक हो रहा है मगर भगवान को कुछ ओर ही मंजूर था। मेरे पति ने शादी के कुछ दिनों बाद ही कहा कि मैं लड़की नही लड़का हूं और मैं तुम्हारे साथ नही रह सकता। इतना ही नहीं, मुझ पर मानहानि का दावा कर मेरे खिलाफ केस भी डाल दिया। 

अकेलापन दूर करने के लिए देवाशीष को किया एडाप्ट
अकेलापन इंसान को खा जाता है, घर भी सूना-सूना रहता था, 2011 में मैंने अपने एक स्टूडेंट देवाशीष को बेटे के रुप में एडाप्ट कर लिया। देवाशीष मुझे मां कहता है तो मेरी आत्मा को  बहुत सुकून मिलता है। देवाशीष के बाद मैंने कई ट्रांसजेंडरों को अपने घर में पनाह दी और उनकी मदद की। वर्तमान में मेरे घर में 4 ओर ट्रांसजेंडर रहते हैं।

खुद की मेहनत से पाया है प्रिंसिपल का पद
मैंने पिताजी शुतरन्जन बंदोपाध्याय 90 साल के हो चुके हैं। मां रेखा बंदोपाध्याय पहले ही गुजर चुकी है। पिता जी नैहाटी में रहते है और उन्हें मेरी जरूरत है। सालों बाद उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया है। नैहाटी कस्बे के पास के ही एक कॉलेज में प्रिंसिपल की वैकंसी निकली हुई थी। मैंने पिता के पास रहने की इच्छा से वहां अप्लाई किया। मैंने रिजर्वेशन नही लिया था, मैंने जनरल कैटेगरी में अप्लाई किया था। आज कुछ लोग कहते हैं कि मुझे ऐसी ही प्रिंसिपल के पद पर बैठा दिया गया है। लेकिन सच यह है कि प्रिंसिपल बनने के लिए एसोसिएट प्रोफेसर होना, 14 साल का एक्सपीरियंस और पीएचडी डिग्री होना अनिवार्य है। मेरे पास यह तीनों थी, इसलिए मैंने अप्लाई किया और यह पद पाया।

रविन्द्रनाथ टैगोर के जीवन से बहुत कुछ सीखा है
मैंने तो तन्हाई में जीना सीखा है। तिरस्कार का घूंट पल-पल पिया है। ट्रांसजेंडर को कोई मदद नही करता। मैंने रविन्द्रनाथ टैगोर के जीवन से बहुत कुछ सीखा है। विवेकानन्द और रामकृष्णन परमहंस को अपना गुरु मानती हूं। विवेकानन्द को खूब पढ़ती हूँ। संघर्ष के दिनों में इन महापुरुषों ने ही मुझे जीने की शक्ति दी है।

ट्रांसजेंडरों को करना चाहती हूं शिक्षित
ट्रांसजेंडर सामाजिक भेदभाव के कारण पढाई से दूर हो जाते हैं और पूरी जिंदगी नाचकर गाकर ही अपना गुजरा करते हैं। यदि ट्रांसजेंडरों को भी उचित सुविधा और संसाधन मुहैया कराए जाए तो ये भी दुनिया में नाम रोशन करने का दम रखते हैँ। मेरा मकसद ट्रांसजेडरों को शिक्षित करना है, अब इसी के लिए प्रयास करुंगी।

डॉ.समीर मल्होत्रा
वरिष्ठ मनोचिकित्सक, मैक्स अस्पताल
हर इंसान की सेक्सुएलिटी एक अहम पहलू है, जैसे समाज के अंदर पुरुष का रोल है, महिला का रोल है, ऐसे ही ट्रांसजेंडर जिस रोल को एडप्ट करना चाहता है, करता है, इससे उन्हें मानसिक सुख मिलता है। इसके लिए कई बार हॉर्मोनल, जेनेटिक कारण होते है तो कई बार इवायरमेंट कारण भी जिम्मेदार होते हैं। जैसा वातावरण और माहौल बचपन में मिलता है, जैसे घर के हालात होते है वैसे ही माहौल में रहकर ट्रांसजेंडर भी अपना माहौल खुद क्रिएट करता है। ऐसा करना गलत भी नही हैं, लेकिन ट्रांसजेंडर बनने के बाद उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए।

देवाशीष
एडाप्टिड चाइल्डमनाबी बंदोपाध्याय
मैं जब भी अपनी मां को मां कहकर पुकारता हो तो वह कहती है मुझे सुकून मिलता है। उन्हें देखकर मुझे भी अंदर ही अंदर एक अलग अनुभूति का एहसास होता है। लोग कहते हैं कि मम्मी ट्रांसजेंडर है, लेकिन मैं आपसे ही पूछता हूं अगर किसी बच्चें की मां मर जाती है तो तब पिता उसे मां की तरह पालता है और लोग कहते हैं कि यह इसकी मम्मी-पापा दोनों है। तो फिर क्यों एक ट्रांसजेंडर को ही अलग नजर से देखा जाता है, क्यों एक ट्रांसजेंडर मां नही हो सकतीमेरी मम्मी बेस्ट मम्मी है। मेरी मम्मी ने जो संघर्ष किया है वह मेरे लिए एक प्रेरणा है और मैं इस प्रेरणा से प्रेरित होकर अपनी मां का नाम दुनिया में रोशन करूंगा। अभी बंग्ला में एमए किया है, यहां तक मां ने ही मुझे गाइड किया। मम्मी हमेशा मुझे गाइड करती है।


मंगलवार, 13 सितंबर 2016

जानें मेडिकल टूरिज्म के तहत क्यों भारत आ रहे हैं विदेशी


यूरोप और अमेरिका, स्पेन, आस्ट्रेलिया आदि देशों में भारत के मुकाबले चिकित्सा मंहगी है। वही,पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान,अफगानिस्तान व खाड़ी देशों में जनसंख्या के सापेक्ष चिकित्सा संसाधनों का अभाव है। इसलिए विदेशों से बड़ी संख्या में लोग भारत ईलाज कराने आ रहे हैं। पिछले 4-5 सालों में मेडिकल टूरिज्म सेक्टर में भारी बूम आया है। सालाना मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसी के चलते अब इण्डिया में इस क्षेत्र में रोजगार की भी अपार सम्भावनाएं बढ़ गई है साथ ही सरकार इस उघोग को विकसित कर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित कर सकता है। मेडिकल टूरिज्म पर प्रकाश डालती एक रिपोर्ट-

भारत के मेडिकल सेक्टर में महाशक्ति बनकर उभरने के संकेत स्पष्ट दिखाई देने लगे है। पिछले 5 वर्षों में विदेशियों की संख्या में लगातार हो रहा इजाफा इसकी पुष्टि करता है। यूं तो भारतीय चिकित्सकों ने चिकित्सा जगत में विश्व पटल पर पहले से ही अपनी धाक जमा रखी है। भारत आ रहे विदेशी मरीजों में ऐसे मुल्कों के मरीज है जिनमें चिकित्सा सेवाएं नही के बराबर है, वही कुछ ऐसे मुल्कों से भी ताल्लुक रखते है जहां चिकित्सा सुविधाएं अपेक्षाकृत बेहतर है और उनकी गिनती विकसित देशों में की जाती है। इन मरीजों के भारत आने के अलग-अलग कारण है। खाड़ी देशों के अतिरिक्त अफगानिस्तान,पाकिस्तान,बंग्लादेश आदि देशों से मरीज इसलिए भारत आते है ताकि उन्हें अच्छी चिकिस्ता सेवाएं उपलब्ध हो सकें। क्योंकि इन देशों में जनसंख्या के सापेक्ष चिकित्सा सुविधाएं नही के बराबर है। वही अमेरिका,आस्ट्रेलिया,स्पेन आदि देशों से मरीज इसलिए भारत पंहुच रहे है क्योंकि वहां चिकित्सा सेवाएं आम आदमी की पंहुच से बाहर है और इलाज कराने के लिए मरीज के एक बड़ी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए इन सभी देशों के लोग भारत जैसे देशों की ओर रूख करने को मजबूर है। ईलाज कराने भारत आ रहे विदेशियों के लिए अब यहां बकायदा कंस्लटेंसी खुल चुकी है जो भारत में इनके रहने से लेकर ईलाज कराने तक का ठेका लेती है। इसकी एवज में मोटी धनराशि इन विदेशी मरीजों से ली जा रही है। मैक्स सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल में एचओडी मेडिसिन के पद पर कार्यरत डॉ.नरेश डैंग के अनुसार भारत में पिछले 4-5 सालों में मेडिकल टूरिज्म ने अपनी जडे जमाई है। विदेशों में ईलाज के लिए मरीजों को बहुत-सी औपचारिकताएं पूरी करनी होती है, तब जाकर कही ईलाज के लिए एप्वाइटमेंट मिलती है। इसके विपरीत भारत में विदेशों के मुकाबले ईलाज तो सस्ता है ही इसके अलावा यहां औपचारिकताएं नाममात्र है। जिसे विदेशी एक पल्स पाइंट के रूप में लेते है। अपोलो के डॉ.एस.त्यागी के अनुसार भारत में किडनी ट्रांसप्लांट,न्यूरोसाइंस, कॉस्मेटिक सर्जरी, हार्ट सर्जरी,कैंसर, आर्गेजन ट्रांसप्लांट के इलाज के लिए भारी संख्या में विदेशी आ रहे है। विदेशी मरीजों को इलाज कराने के लिए यहां 2-3 महीने तक रहना भी पड़ता है। आज के समय में  ईलाज कराने के लिए भारत विदेशियों की पहली पंसन्द बना हुआ है।

जाने मेडिकल टूरिज्म को
मेडिकल टूरिज्म का अर्थ है कि किसी दूसरे देश में जाकर ईलाज कराना। विदेशों में ईलाज बेहद मंहगा होने के साथ-साथ औपचारिकताएं भी अधिक है। वही भारत जैसे मुल्क में ईलाज विदेशों की अपेक्षा सस्ता और सुलभ है। इसी का लाभ उठाने के लिए विदेशी मरीज यहां आकर ईलाज कराना चाहते हैं। भारत में सालाना विदेशी मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में मेडिकल टूरिज्मके क्षेत्र में सालाना 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो रही है।

विदेशियों के भारत आने की वजह क्या है
इलाज के मामले में सबसे बुरी हालत अत्यधिक सम्पन्न और विकसित कहे जाने वाले देशों की है। इनमें यदि अमेरिका की बात करें तो, वहां यदि किसी व्यक्ति को तत्काल कोई सर्जरी  करानी हो तो वह संभव नही है। क्योंकि वहां के अस्पतालों में मरीजों को इतनी अधिक औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं कि उसे करते-करते मरीज की मौत भी हो सकती है। अमेरिका से भारत में कडनी ट्रांसप्लांट कराने आई विलियम्स विले से जब ये पूछा गया कि वह अमेरिका में रहते हुए भी भारत ईलाज कराने क्यों आए है तो उनका कहना था कि अमेरिका में इलाज कराना किसी बड़ी मुसीबत को गले लगाना है। वहां इलाज कराने की प्रक्रिया में ही मरीज लाचार और बेबस हो जाता है। उनके अनुसार अमेरिका में ईलाज कराने से पहले मरीज को अपना नाम उस अस्पताल में रजिस्टर कराना होता है जहां वह इलाज कराना चाहता है। 2-3 महीने के बाद मरीज को अपांइटमेन्ट दी जाती है, वह भी लगभग एक से डेढ़ महीने बाद की होती है। बकौल विलियम्स, भारत में इलाज के लिए मरीज को औपचारिकताएं नाममात्र को पूरी करनी होती है साथ ही यदि आपातकाल में मरीज को किसी चिकित्सक की सलाह की जरूरत हो तो वह भी हर समय उपलब्ध रहती है और यहां इलाज में लगने वाली रकम भी विदेशी देशों के मुकाबले अत्यधिक कम है। आफगानिस्तान से अपोलो दिल्ली में ईलाज कराने आए एक युवक के अनुसार उनके देश में चिकित्सा संसाधनों का अभाव है, वही भारत में चिकित्सा की अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध है। हांलाकि उनके देश के मुकाबले भारत का ईलाज मंहगा है मगर ओर देशों के मुकाबले भारत का ईलाज भी सस्ता है। इसलिए वह ईलाज कराने भारत ही आते है। स्पेन से इलाज कराने के लिए भारत आए जैक्सन ब्रैनले ने जनवाणी को बताया कि स्पेन में अस्पताल मरीज का ईलाज करने से पहले ये जांचते है कि क्या मरीज का मेडिकल बीमा है या नही । स्पेन में मेडिकल बीमा कराना भी आम आदमी की पंहुच में नही है,क्योंकि इसकी एवज में एक मोटी रकम अदा करनी होती है, जो आम आदमी की पंहुच से बाहर है। अगर मरीज का मेडिकल बीमा नही होता तो अस्पताल ईलाज करने में आनाकानी करते है, यही वजह है कि उन्हें भारत का मेडिकल सेक्टर बहुत भाया है। वह इससे पहले भी अपने पिता का ईलाज कराने भारत आ चुके है।

मेडिकल टूरिज्म का साइड इफेक्ट
विशेषज्ञों की मानें तो विदेशी मरीजों की बढ़ती संख्या भारतीय मरीजों के लिए पेरशानी का सबब बन सकती है। सरकार ने यदि समय रहते इस उघोग को विकसित नही किया तो भारतीय मरीजों को ही सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। प्रोफेसर डॉ.हरनेक सिंह गिल के अनुसार विदेशी यहां आकर ईलाज कराने की एवज में जो धनराशि देते है वह भारतीय मरीजों द्वारा दी गई धनराशि से ज्यादा होती है। ऐसे में प्राइवेट चिकित्सालय विदेशी मरीजों को ही वरीयता देगें। विदेशी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सरकार को समय रहते इस उघोग को विकसित करने पर विचार करना चाहित ताकि विदेशी मुद्रा का भी अर्जन हो सके और आने वाले समय में भारतीयों को परेशानी का सामना ना करना पड़े।

सेरोगेसी भी है इसी का हिस्सा
सेरोगेसी जिसे किराए की कोख कहने में भी कोई श्योक्ति नही होनी चाहिए, भी मेडिकल टूरिज्म का ही एक हिस्सा है। विदेशों से बड़ी संख्या में दंम्पत्ति भारत आकर किराए की कोख खरीद रहे हैं। सेरोगेसी से प्राप्त बच्चे के लिए विदेशी दंपत्ति 40-50 लाख रूपये देते है। भारत में यूपी और बिहार की महिलाएं इस धन्धें में सबसे ज्यादा लिप्त है। विदेशी दम्पत्तियों के लिए ऐसी महिलाओं को ढूढने का काम कंस्लटेंसी करती है। इन दम्पत्तियों से तो ये कंस्लटेसी मोटी रकम लेती है मगर सेरोगेट मदर को ये मात्र दो-तीन लाख रूपये ही देते है। इसकी पुष्टी हाल ही में दिल्ली की एक एनजीओ सेंटर फॉर सोशल रिसर्च द्वारा कराये गये ताजा अध्ययन में हुई है।

विदेशों के मुकाबले कितना सस्ता है इलाज
ऑपरेशन-                 विदेश-                   भारत

लीवर ट्रांसप्लांट-            3-4लाख-                 60 हजार

आर्थोपैडिक सर्जरी-          20-30 हजार-             7-8 हजार

हार्ट सर्जरी-               35-40 हजार-             7-9 हजार

कॉस्मेटिक सर्जरी-          25-30 हजार-             2-3 हजार

बोन मैरो ट्रांसप्लांट-         2-3 लाख-                30-35 हजार

(यह खर्चा अमेरिकी डॉलर में है और यह आंकलन अपोलो के चिकित्सकों का अनुमानित है, इसके अलावा मरीज के रहने और कंस्लटेंसी का खर्च अलग है)

हर साल भारत में बढ़ रही है विदेशी पर्यटकों की संख्या
पर्यटन मंत्रालय के आकड़ों पर गौर करे तो भारत के राज्‍यों और संघ-शासित राज्‍यों में 2011 की तुलना में वर्ष 2012 के दौरान विदेशीपर्यटकों की यात्राओं की संख्‍या में 6.33 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि2010 की तुलना में 2011 में 8.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। राज्‍यों और संघ-शासित राज्‍यों में विदेशी पर्यटक यात्राओं की संख्‍या 2012 के दौरान20.7 मिलियन रही, जबकि 2011 में यह संख्‍या 19.5 मिलियन और2010 में 17.9 मिलियन रही थी। गत माह जून 2013 में विदेशी पर्यटकों के आगमन में भी 2.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जून 2012  के4.33 लाख की तुलना में जून 2013  में 4.44 लाख विदेशी पर्यटक भारत आए। जनवरी से जून 2013  के बीच 33.08  लाख पर्यटक आए,जबकि पिछले साल जनवरी से जून के बीच 32.24 लाख पर्यटक आए थे। इस तरह इस साल जनवरी से जून के बीच भारत आने वाले पर्यटकों की संख्‍या में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
विदेशी मुद्रा में भी हो रहा इजाफा
पर्यटन मंत्रालयों के आकड़ों के अनुसार पिछले साल की सापेक्ष जून2013  में विदेशी पर्यटन से कमाई बढ़कर 551 करोड़ रुपये हो गई। जून2013  में विदेशी पर्यटकों से 7,036 करोड़ रुपये की कमाई हुई, जबकि यह कमाई 2012  के जून में 6,485 करोड़ रुपये थी। वही जून 2011 में विदेशी पर्यटकों से 5,440 करोड़ रुपये का अर्जन हुआ था।

सोमवार, 12 सितंबर 2016

किताबों का ऑनलाइन प्लेटफार्म: नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी

कल्पना कीजिए एक ऐसे ऑनलाइन पोर्टल की जहां स्कूल जाने वाले बच्चें से लेकर हायर एजुकेशन प्राप्त कर रहे नौजवान तक के लिए ऑडियोवीडियोडिजिटल आदि तरीके से तमाम स्टडी मैटीरियल मौजूद हो। आप शायद इसे काल्पनिक ही समझे लेकिन इस कल्पना को सच कर दिखाया है आईआईटी खड़गपुर ने एनडीएल यानि नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी के माध्यम से। यह लाइब्रेरी नेशनल मिशन ऑन एजूकेशन थ्रू इनफार्मेशन एण्ड कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी के तहत विकसित की जा रही है। नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी के बारे में विस्तार से बता रहा है यह आलेख-


नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी ऐसा ऑनलाइन प्लेटफार्म है जहां 40 प्रकार के लर्निंग रिसोर्स और एक लाख लेखकों द्वारा लिखे गए 13 लाख से भी ज्यादा लेख आदि मौजूद है। इतना ही नहीं, एनडीएल पर रविन्द्र नाथ टैगोर के साहित्य को भी डिजिटल रुप दिया गया है। इसके अलावा यहां 2 लाख से अधिक ऑडियो किताबें, एनसीईआरटी की सभी कक्षाओं की सभी किताबें, विभिन्न संस्थानों से भारतीय शोधार्थियों द्वारा लिखित 36 हजार से अधिक थीसिस एवं सिनॉप्सिस, 50 हजार से अधिक कृषि संबंधी पुस्तकें व शोध,5 लाख से अधिक वैश्विक शास्त्रीय पुस्तकें आदि मौजूद है, यह सब सुविधा सरकार की ओर से छात्रों को निशुल्क मुहैया कराई जाएगी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) की पहल पर आईआईटी खड़गपुर द्वारा विकसित की गई इस डिजिटल लाइब्रेरी का पहले चरण का काम भी पूरा नही हुआ है लेकिन अभी भी यहां इतना स्टडी मैटीरियल ऑनलाइन हो चुका है कि पीजी स्तर के छात्रों को भी कोई असुविधा ना हो। साइट की देखरेख कर रहे आईआईटी खड़गपुर की टीम का मानना है कि पहला चरण मार्च 2018 तक पूरा होगा। पूरी साइट को दो चरणों में अंतिम रूप दिया जाएगा। साइट का काम पूरा होने के बाद यह विश्व का अपनी तरह का सर्वश्रेष्ठ प्लेटफार्म होगा जहां शिक्षा प्राप्त करने वालों के लिए तमाम तरह का स्टडी मैटीरियल मौजूद होगा। भविष्य में एनडीएल पर अध्ययन सामग्री अंग्रेजीहिन्दी के साथ ही 70 भाषाओं में मौजूद होगी। एनडीएल पर अध्ययन सामग्री टेक्सटऑडियो,वीडियो और प्रजेन्टेशन के चार फार्मेट में मौजूद हैं। इस पोर्टल पर मिलने वाली तमाम जानकारी अधिकृत होगी क्योंकि देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों के डिजिटाइज्ड और डिजिटल कंटेन्ट ही इससे लिंक किए गए हैं। एनडीएल की सबसे खास बात यह होगी कि यहां स्टडी मैटरियल से संबंधित किसी भी समस्या पर एक्सपर्ट से ऑनलाइन पूछताछ भी की जा सकती है। एनडीएल पर मौजूद तमाम स्टडी मैटीरियल को पाठक डाउनलोड भी कर सकता है और अपने किसी मित्र को ऑनलाइन भेज भी सकता है।

पलक झपकते ही सामने होता है स्टडी मैटीरियल
नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी पर यदि आपको किसी टॉपिक से संबंधित जानकारी चाहिए तो उसके लिए सिर्फ आपको एक पलक ही झपकनी होगी। साइट को हाई कंफिग्रेशन पर डिजाइन किया गया है ताकि कम से कम समय में उचित स्टडी मैटीरियल पाठक तक पहुंच सकें। साइट को ओपन करते ही सामने सर्च बार नजर आएगा। इस सर्च बार में जो भी टाइप किया जाएगा, उससे संबंधित डिजिटल लाइब्रेरी में मौजूद तमाम मैटीरियल एक सेकेंड से भी कम समय में स्क्रीन पर नजर आ जाएगा। उदहारण के तौर पर यदि हम कबीर सर्च करते हैं तो मात्र 0.34 सेकेंड में कबीर से जुडे 687 स्टडी मैटीरियल नजर आएंगे। इसके बाद जिस मैटीरियल को आप पढ़ना चाहते हैं उस पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं। साथ ही यहां से आप अपने किसी परिचित को वह स्टडी मैटीरियल ईमेल से भेज भी सकते हैं।

ऐसे करें खुद को रजिस्टर्ड
www.ndl.iitkgp.ac.in पर पहुंचकर होम पेज में रजिस्ट्रेशन का लिंक दिया हुआ है। इस लिंक पर क्लिक करें और मांगी गई जानकारी दें। रजिस्ट्रेशन करने से पहले ये भी सुनिश्चित कर लें कि आप डिजिटल लाइब्रेरी का इस्तेमाल किस लिए करेगें। जैसे अपना कोर्स की पढ़ाई के लिए, लिटरेचर पढ़ने के लिए इत्यादि। रजिस्ट्रेशन के दौरान यह जानकारी भी अपलोड करनी होगी। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर बिना रजिस्ट्रेशन भी डिजिटल लाइब्रेरी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

गरीब बच्चों को मिलेगा फायदा
हायर एजुकेशन के दौरान मंहगी किताबों का बोझ ना उठा पाने वाले गरीब बच्चों को डिजिटल लाइब्रेरी का सबसे अधिक फायदा होगा। क्योंकि मंहगी किताबें ना खरीद पाने की वजह से गरीब वर्ग के बच्चें पढाई छोड़ देते हैँ। लेकिन नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी का उपयोग करके अब गरीब बच्चें भी ऑनलाइन किताबों से परीक्षा पास कर सकेंगे।

ये है नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी में खास
विभिन्न लेखकों व प्रकाशकों के तेरह लाख से अधिक पाठ्य सामग्री होगी उपलब्ध।
इस वेबपोर्टल को पूरे देश में समझने के लिए इसे 70 भाषाओं में बनाया जा रहा।
ऑनलाइन जुड़ जाएंगे शैक्षणिक संस्थान
प्राइमरी से पीजी लेबल तक एजुकेशन मेटेरियल एक विंडो पर उपलब्ध।
इस वेबपोर्टल पर चालिस से अधिक लर्निंग रिसोर्सेस होंगे उपलब्ध।

जानें रेटिना से जुडी 3 खास बिमारियां


वर्ल्ड रेटिना वीक (19 से 25 सितंबर)
  
आंखें हमारे शरीर के वो महत्वपूर्ण अंग हैंजो हमें पूरी दुनिया से परिचित कराने का कार्य करते हैं. अकसर हम इनकी देखभाल में लापरवाही बरतते हैं और इनका महत्व तब पता चलता हैजब इन्हें नुकसान पहुंच जाता हैलेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है. आंख का महत्वपूर्ण हिस्सा रेटिना है. इसमें समस्या होने पर कई ऐेसे रोग होते हैंजो नेत्रहीन बना सकते हैं. वर्ल्ड रेटिना वीक पर यह आलेख देता विशेष जानकारी-

रेटिना क्या है
रेटिना आंख के अंदर मौजूद एक नाजुक प्रकाश संबंधी परत हैहमारी आंख को देखने के लिए रेटिना की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। हम जो कुछ भी देखते है वह प्रकाश (लाइट) के माध्यम से आंख के अंदर मौजूद रेटिना पर डलता है,रेटिना उस प्रकाश को छवि में बदलती है। तब जाकर हमारी आंखें देख पाती है।

1.डायबिटिक रेटिनोपैथी
विश्व में डायबिटीक रेटिनोपैथी अंधेपन का स
बसे बड़ा कारण है। यह एक ऐसी बिमारी है जिसमें डायबिटीज से ग्रस्त व्यक्ति की रेटिना रक्त पहुंचाने वाली महीन नलियों के क्षतिग्रस्त हो जाने की वजह से ठीक प्रकार से काम नही कर पाती। डायबिटीक रेटिनोपैथी का ट्रीटमेंट यदि सही समय पर ना कराया जाए तो इससे पीड़ित व्यक्ति अंधेपन का शिकार हो सकता है
, जोकि लाइलाज है।

डायबिटीज से ये भी हो सकता है
डायबिटिक रेटिनोपैथी के अलावा डायबिटिज की वजह से आंखों में कई अन्य प्रकार की बिमारियां भी देखने को मिलती है जिसमें आंखों की दृष्टि का कम हो जाना, कम उम्र में मोतियाबिंद हो जाना, आप्टिक नर्व का प्रभावित हो जाना, आंख की मांसपेशियों का खराब हो जाना भी शामिल है।

जाने कैसे करता है प्रभावित
डायबिटिज होने पर ब्लड में शूगर की मात्रा बढ़ जाती है। शूगर की बढ़ी हुई मात्रा खून ले जाने वाली नलियों को क्षतिग्रस्त कर देती है। कई बार तो नलियां नियमित रुप से शूगर बढ़ने के कारण रक्त स्राव तक कर देती है। रेटिना तक खून की सप्लाई करने वाली अत्याधिक महीन नलियों में भी शूगर बढ़ने के कारण कमजोरी आने लगती है। महीन नलियां रेटिना को जरूरी पोषक तत्व और ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा नही दे पाती। जिससे रेटिना में सूजन पैदा हो जाती है। इससे दृष्टि कमजोर होती है। धीरे-धीरे जैसे बिमारी बढ़ती है वैसे वैसे लक्षण भी बढ़ने लगते हैँ। कमजोर हुई रक्तनलियां ईलाज के अभाव में कई बार तो फट भी जाती है, रक्त स्राव होने की वजह से आंख में ब्लाइंड स्पाट बना देता है।

डायबिटिक रेटिनोपैथी केवल डायबिटिज से ग्रस्त लोगों को ही सकता है लेकिन इनमें भी कुछ खास लक्षणों में इसके होने की संभावना ज्यादा है जोकि निम्न है-
-नियमित अनियंत्रित शूगर रहने वाले लोगों में
-हाई कोलेस्ट्रोल से पीड़ित में
-हाई बीपी से पीड़ित में

ट्रीटमेंट है जरूरी
चूंकि डायबिटिक रेटिनोपैथी कभी भी गंभीर रूप लेने में सक्षम होती है इसलिए जब भी पता चले तभी चिकित्सक से संपर्क कर ट्रीटमेंट कराए। डायबिटिक रेटिनोपैथी का ईलाज करने के लिए कई प्रकार से ईलाज किया जाता है जोकि निम्न है-
फोकल लेजर ट्रीटमेंट-इसे फोटोकोगूलेशन भी कहा जाता है। इस लेजर ट्रीटमेंट का इस्तेमाल तब किया जाता है जब रेटिना को खून सप्लाई करने वाली महीन नलियां क्षतिग्रस्त हो जाती है। लेजर ट्रीटमेंट में लेजर बर्न्स की मदद से क्षतिग्रस्त नलियों से रक्त स्राव को रोका जाता है। यह ट्रीटमेंट डॉक्टर के चैंबर में ही मशीनों की मदद से आसानी से हो सकता है।
स्कैटर लेजर ट्रीटमेंट- इसे पेनरेटिनल फोटोकोगूलेशन भी कहते हैँ। यह लेजर ट्रीटमेंट 2 सेशन में होता है। खून में शूगर की मात्रा बढ़ने से रक्त नलियां भी अव्यवस्थित हो जाती है। रक्त नलियां कुछ जगह मोटी तो कुछ जगह बिल्कुल महीन नजर आती है। ऐसे में चिकित्सक स्कैटर लेजर ट्रीटमेंट की मदद से रेटिना के आसपास की रक्त नलियों को व्यवस्थित करते हैं।
विट्रीक्टोमी-रक्त नलियों के फट जाने की वजह से आंख में बने ब्लाइंड स्पोट को हटाने के लिए इस ट्रीटमेंट का इस्तेमाल किया जाता है। इस शल्य चिकित्सा में आंख में चीरा लगाकर रेटिना के आसपास ने ब्लड स्पोट को हटाया जाता है।

एक बार ट्रीटमेंट के बाद दोबारा रेटिनोपैथी होने का भी है खतरा
यदि आप सोच रहे हैं कि डायबिटिक रैटिनोपैथी का ट्रीटमेंट होने के बाद आप अपनी आंखों को हमेशा के लिए डायबिटीज से बचा सकते हैं तो आप गलत हैँ। क्योंकि डायबिटिक रेटिनोपैथी के ट्रीटमेंट होने के बाद भी इसके दोबारा होने के चांसेज कही ज्यादा होते हैं। चिकित्सक बताते हैं कि गलत खानपान और जीवनशैली की वजह से दोबारा मरीज इस बिमारी की चेपट में आ सकता है। इसलिए ट्रीटमेंट कराने के बाद भी आंखों की देखभाल करें और अपनी शूगर को नियंत्रित करने की कोशिश करें।

2.रेटिनल डिटेचमेंट
रेटिनल डिटेचमेंट यानि रेटिना का अपनी जगह से खिसक जाना। यह आंखों की एक गंभीर बिमारी है जिसमें रेटिना अपनी जगह से हट जाती है। आंख में रेटिना टिश्यू से घिरी होती है लेकिन डिटेचमेंट में यह टिश्यू से हट जाती है। इस अवस्था में रेटिना ठीक प्रकार से काम नही कर पाती जिससे पीड़ित व्यक्ति अंधेपन का शिकार भी हो जाता है। हालांकि ट्रीटमेंट के द्वारा रेटिना को वापस ठीक किया जा सकता है। रेटिनल डिटेचमेंट होने का खतरा तब ज्यादा बढ़ जाता है जब व्यक्ति की आंख पहले से किसी दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हुई हो या फिर कैटरेक्ट सर्जरी कराई हो। अगर आपके परिवार में किसी को रेटिनल डिटैचमेंट की समस्या होतब भी आपको यह बीमारी हो सकती है। रेटिनल डिटेचमेंट होने के बाद व्यक्ति को कोई दर्द नही होता लेकिन आंख ठीक प्रकार से काम नही कर पाती।

तीन प्रकार का होता है रेटिनल डिटेचमेंट
रेटिनल ब्रेक-इसे रेग्मैटोजिनस रेटिनल डिटेचमेंट भी कहते है। इसमें आंख के बीच में मौजूद विट्रियस नामक फ्लूड रेटिनल टीअर से निकलने लगता है, फ्लूड निकलने की वजह से रेटिना अपने स्थान से खिसकने लगता है।
एक्सुडेटिव रेटिनल डिटेचमेंट-इस प्रकार में भी तरल पदार्थ रिटाना टिअर से बाहर निकलता है लेकिन इसका कारण ट्यूमर या रेटिना मे किसी विकार की वजह से होता है। इसे एक्सुडेटिव रेटिनल डिटेचमेंट कहा जाता है।
ट्रैक्शन रेटिनल डिटेचमेंट-यह डायबिटिक रेटिनोपैथी की वजह से होता है। इसमें रेटिना को ठीक प्रकार से पोषक तत्व नही मिल पाते हैँ।


यह है रेटिनल डिटेचमेंट के लक्षण
-आंख से देखते समय स्पाट नजर आना
-देखते समय अंधेरा छा जाना
-पास या दूर की दृष्टि अचानक से कमजोर हो जाना

कई प्रकार से होता है रेटिनल डिटेचमेंट का ट्रीटमेंट
लेजर व फ्रिजिंग-यह दोनों प्रकार बिमारी के शुरुआती चरण में इस्तेमाल किये जाते हैं। यदि डिसप्लेसमेंट कम है तो लेजर व फ्रिजिंग विधि के माध्यम से रेटिना को ठीक किया जाता है।

न्यूमेटिक रेटिनोपैक्सी- यदि रेटिना अपनी जगह से बहुत मामूली हटी है तो उसके लिए न्यूमेटिक रेटिनोपैक्सी ट्रीटमेंट किया जाता है। इसमें एक गैस के सूक्ष्म गुबारे को इंजेक्शन के माध्यम से आंख के अंदर डाला जाता है। क्षतिग्रस्त जगह पर गैस के सूक्ष्म गुबारे को भेजकर रेटिना के विपरीत दबाव बनाया जाता हैऐसा करने से गैप भर जाता है। उसके बाद लेजर की मदद से रेटिना को पुरानी जगह पर लाया जाता है।

स्क्लेरल बक्कल-यह विधि सबसे कामयाब और पुरानी है। इस तकनीक के माध्यम से शुरुआती चरण के रेटिनल डिटेचमेंट को ठीक किया जाता है। इस सर्जरी में आंख के अंदर मौजूद स्केलरा (आंख में सफेद नजर आने वाला) को सिलिकन बैंड की मदद से धकेला जाता है। बैंड हमेशा के लिए आंख में रहता है। इससे रेटिना वापस अपनी पुरानी जगह पर आ जाता है। यह सर्जरी 2-3 हफ्ते तक रिकवर होती है। हालांकि मरीज सर्जरी के तुरन्त बाद कुछ घंटों के अंदर घर जा सकता है।

3.मेक्यूलर डीजेनरेशन
रेटिना के बीच के पार्ट को मैक्यूला कहते हैं, ये नजर को केन्द्रित करने का काम करता है, इसमें विकार उत्पन्न होने पर मेक्यूलर डीजेनरेशन होता है। आमतौर पर मैक्यूला ही हमारी पढ़ने की क्षमता, चेहरे पहचानने की क्षमता, वाहन चलाने के लिए ध्यान केन्द्रित करने के लिए जिम्मेदार होता है। मैक्यूला में साफ, तेज और केन्द्रीय दृष्टि के लिए संवेदनात्मक कोशिकाएं रहती है।  आयु संबंधित मैक्यूलर डीजेनरेशन से पीड़ित व्यक्तियों में एक या दोनों नेत्रों की केन्द्रीय दृष्टि आंशिक या पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। अधिक उम्र के लोगों में यह बिमारी ज्यादा देखने को मिलती है।

दो प्रकार का होता है आयु संबंधी मेक्यूलर डीजेनरेशन
ड्राई मेक्यूलर डीजेनरेशन-यह प्रकार सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। इस प्रकार का मेक्यूलर डीजेनरेशन धीरे-धीरे बढ़ता है। मैक्यूला में मौजूद टिश्यू के पतले होने के कारण उसकी केन्द्रीय दृष्टि नष्ट हो जाती है। इसके अलावा ड्राई मेक्यूलर डीजेनरेशन में मैक्यूला के आसपास फैटी प्रोटीन भी जम जाता है।
वेट मेक्यूलर डीजेनरेशन-यह प्रकार बहुत कम देखने को मिलता है। इस प्रकार का मेक्यूलर डीजेनरेशन बहुत तेजी से विकसित होता है। इसमें रेटिना के नीचे नयी रक्त नलियां विकसित होती है। ये रक्त नलियां रक्त व द्रव पदार्थ का रिसाव करने लगते हैं जिससे रेटिना कोशिकाएं गंभीर रूप से नष्ट हो जाती है जो मैक्यूला और केन्द्रीय दृष्टि को प्रभावित करती है।

ये है प्रारंभिक लक्षण
-छोटे अक्षर पढने में परेशानी होना
-धुंधली दृष्टि
-तस्वीरें साफ ना दिखाई देना
-आंख के सामने काला धब्बा नजर आना
-सीधी लाइन साफ नजर ना आना

ट्रीटमेंट है जरूरी
यह बिमारी ऐसी है कि इसमें पता चलते ही तुरन्त ट्रीटमेंट कराने पर बिमारी का असर कम किया जा सकता है। आंख में विकसित खराबी को दोबारा ठीक नही किया जा सकता। नई रक्त नलियों के विकास को रोकने के लिए चिकित्सक एंटी वीईजीएफ इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। दूसरे उपचार में चिकित्सक मरीज को फोटोडायनेमिक थैरेपी की सलाह देते हैं। इसमें मैक्यूला डीजेनरेशन को कम करने का प्रयास किया जाता है। इसके अलावा लेजर थैरेपी की मदद से भी असामान्य रक्त नलियों को खत्म किया जाता है। लेकिन यह बिमारी उम्र के अंतिम पड़ाव में होती है इसलिए नेत्र दृष्टि पूरी तरह से वापस नही आ पाती।

बरते ये सावधानी
-जब भी धूप में निकले तो चश्मा पहन कर निलते। चश्मा पराबैगनी किरणों से आंखों को बचाने वाला हो।
-डैस्कटॉप या लैपटॉप पर काम करते समय 15-20 मिनट के अंतराल पर आंखों को आराम दें।
-दिन में कम से कम 4-5 बार आंखों को ठंडे पानी से धोएं।
-टीवी देखने के दौरान भी आंखों को आराम देते रहें।
-सुबह के समय हरी घास पर वॉक करे। इससे आंखों की रोशनी बढ़ती है।

ये भी है रेटिना से जुडी कुछ बिमारियां
इंफेक्शियस रेटिनीटिस- इस बिमारी में रेटिना में वायरस, बैक्टीरिया, फंगी या पैरासाइट की वजह से इंफेक्शन हो जाता है। इंफेक्शन की वजह से आंख में कई अन्य प्रकार की समस्या नजर आने लगती है। समय रहते इंफेक्शन से आंखों को बचाने के लिए ट्रीटमेंट बेहद जरूरी है।

कोरोइड डिटेचमेंट-कोरोइड आंख के अंदर मौजूद ब्लड वेसल्स होती है जोकि आंख की बेक वॉल और रेटिना को जोड़ती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण काम आंख के बाहरी हिस्से को ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाने का होता है। लेकिन फ्लूड या ब्लड की वजह से कई बार यह अपनी जगह से हट जाता है। इसे ही कोरोइड डिटेचमेंट कहते है। यह रोग भी काफी देखने को मिलता है।

यह है नई तकनीक
रेटिना के क्षतिग्रस्त होने पर सिलिकॉन ऑयल से रिपेयर करने की तकनीक ईजाद की है। इस तकनीक में इंजेक्शन के माध्यम से रेटिना में सिलिकॉन ऑयल डाला जाता है। तीन महीने तक सिलिकॉन ऑयल रेटिना में ही रहता है और रेटिना के विकार ठीक करता है। जब रेटिना ठीक हो जाता है तो ऑपरेशन की मदद से सिलिकॉन ऑयल को निकाल दिया जाता है।

 
ध्यान रहें प्रोटीन सप्लीमेंट और स्टेराइड है आंखों के लिए खतरनाक
बॉडी बनाने के लिए प्रोटीन सप्लीमेंट का इस्तेमाल करने वाले युवाओं के लिए अधिक समय तक प्रोटीन पाउडर इस्तेमाल करना काफी खतरनाक है। चिकित्सक बताते है कि प्रोटीन सप्लीमेंट से आंखों का इंट्रा आक्यूलर प्रेशर अत्याधिक बढ़ जाता है। इंट्रा आक्यूलर प्रेशर बढ़ने की वजह से काला मोतिया होने का खतरा भी बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, जिम करने वाले युवा बॉडी बनाने के लिए स्टेराइड का भी इस्तेमाल करते हैं, आंख के लिए नियमित स्टेराइड इस्तेमाल करना भी जहर के समान है। यह भी आंखों का इंट्रा आक्यूलर प्रेशर बढाता है।

(दिल्ली स्थित अभियान हाई सेंटर की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ.मेघा से बातचीत पर आधारित)