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शनिवार, 17 सितंबर 2016

जाने अभिनेत्री सुधा चंद्रन ने डिसेबिलिटी को चैलेंज कर कैसे पाया खुद का मुकाम (interview of sudha chandran)


सुधा चंद्रन नृत्य जगत का एक ऐसा नाम है जिन्होंने विकलांगता को बोना साबित कर आधी आबादी को एक नया नजरिया देते हुए अपनी मंजिल हासिल की। वर्ष 1981 में एक दुर्घटना में सुधा का एक पैर हमेशा के लिए जिस्म से जुदा हो गया। मगर उन्होंने कृत्रिम पैर के जरिए अपनी इस कमी को पूरा किया और नृत्य जगत में अपनी एक अनूठी छाप छोड़ी। वर्तमान में सुधा कई टीवी सीरियल्स में भी काम कर रही है। हमने की नृत्यांगना सुधाचंद्रन से बातचीत। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश-

नृत्यांगना (डांसर) बनने का ख्याल कैसे आया?
मुझे डांसर बनाने की ख्वाहिश मेरी मां की थी। मां एक बड़ी क्लासिकल सिंगर थी वो चाहती थी कि वो एक डांसर बने। लेकिन उनका वो सपना साकार नही हो पाया, इसलिए उन्होंने मुझे डांसर बनाने की ठानी। जब मैं तीन साल की थी, तब मुझे मां डांस स्कूल लेकर गई, वहां के गुरुओं ने इतनी कम उम्र में डांस सीखाने पर आपत्ति जताई और एडमिशन देने से मना कर दिया। मगर मेरी मां अपनी जिद्द पर अड़ी रही और उन्होंने गुरुओं को विश्वास दिलाया कि वह खुद भी डांस क्लास के बाद घर पर खूब मेहनत कराएगी। इतना ही नहीं, मां इतनी उत्सुक थी कि उन्होंने यह भी कहा था कि यदि तब भी आपको लगे की बच्ची अच्छा परफोर्म नही कर रही है तो तब आप एडमिशन कैंसल कर देना। और इसी तरह मेरा तीन साल की उम्र में डांस स्कूल में एडमिशन हो गया। बाद में यह मेरी कब हॉबी बन गई, पता ही नही चला।
नृत्य का आपके व्यक्तिगत जीवन पर किस प्रकार प्रभाव पड़ा है?
बहुत प्रभाव पड़ा है। (फिर थोड़ा रुककर) डांस हैज लॉट ऑफ डाइमेंश्नस इन माई लाइफ ! शुरुआत में मैं अपनी मां के लिए डांस करती रही, फिर एक ऐसा समय भी आया जब यह मेरी हॉबी बन गई। लेकिन मेरे एक्सीडेंट के बाद यह मेरे लिए एक चैलेंज-सा बन गया। एक हॉबी की तरह जिसकी शुरूआत हुई थी, वो एक चैलेंज बनकर मेरे सामने खड़ा हो गया। जब मैंने वो चैंलेज भी पार किया तो लगा कि जिंदगी में सब कुछ मिल गया है। आज जब भी मैं डांस करती हुं तो मुझे महसूस होता है कि जिंदगी की कई प्रोबलम्स सोल्व हो गई है। मैं हमेशा कहती भी हूं कि जब भी आप दिल से डांस करते हैं तो जिंदगी की कई परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है।

बदलते परिपेक्ष्य में नृत्य को किस नजरिए से देखती है?
डांस तो हर जमाने में एक ही है। यह कह सकते है कि फोर्म ऑफ डांस काफी बदल रहे हैँ। अगर आप देखे तो आज वेस्टर्न डांस का चलन बहुत ज्यादा बढ़ गया है लेकिन दूसरी ओर क्लासिकल और सेमी-क्लासिकल डांस भी वापस चलन में आ रहा है। क्लासिकल डांस इज द मदर ऑफ ऑल डांसिज।

नाचने से तन स्वस्थ्य, मन प्रसन्न और आत्मा तृप्त होती है, क्या आप इसे मानते हैं?
यस, आर्ट इज डिवाइन। जब भी मैं डांस करती हूं तो लगता है कि मैं कही ना कही परमात्मा से जुड चुकी हूं। मेरा मानना है कि अगर ऐसा किसी के साथ नही होता तो वह कभी डांस नही कर सकता। डांस कभी भी हाथ-पैर हिलाने से नही होता। डांस दिल से जुडता है और जब कोई भी आर्ट फॉर्म दिल से जुड़ता है तो उसका तात्पर्य यही है कि आप डायरेक्टली परमात्मा से जुड़ जाते हो।

आप जब नाचते हुए पीक पर पहुंचती है तो उस समय क्या फील करती है?
कुछ फील नही होता, मैं सबकुछ भूल जाती हूं। नचाने के दौरान मैं अपनी एक अलग दुनिया क्रिएट करती हूँ। उसी दुनिया मैं रम जाती हूं। मुझे फिर कोई ऑडिएस नजर नही आती, कोई सोंग सुनाई नही देता, कोई ऑर्केस्ट्रा दिखाई नही आता। हां, स्टेज पर जाने से पहले जरूर मन मैं सोचती हूं कि कोई गलती ना हो और भगवान से प्रार्थना करती हूं कि यह प्रोग्राम सफल रहे।

तन की छिरकन और मन की थिरकन में कैसा नाता होता है?
मेरा मत इन्हें लेकर छोड़ा अलग है। मैं मानती हूं कि दोनों एक ही है। क्योंकि अगर आप मन से थिरकेंगे तो आपका पैर थिरकेगा और जब आपका पैर थिरकता है तो तब बदन थिरकेगा। हां, यह हो सकता है कि खाली परफोर्म करने के लिहाज से आप स्टेज पर जाए तब मन की थिरकन गायब रहती है। लेकिन उसमें रियलिटी नजर नही आती, परफोर्मेंस केवल बनावटी नजर आता है। लेकिन जब आप दिल से परफोर्म करने के लिए स्टेज पर जाते हैं तो दिल, मन, तन सब साथ-साथ थिरकते हैँ।

एक डांसर को सबसे ज्यादा संतुष्टी कब मिलती है?
किसी भी परफोर्मेंस के बाद जब लोग खड़े हो जाते हैं, हॉल तालियों से गूंज उठता है, उससे ज्यादा संतुष्टी किसी डांसर को ओर कहां मिलेगी? जैसे में एक दैवी का रूप धारण करती हूं, शक्ति के नाम से एक बैले करती हूंकृष्ण पर भी करती हूं, परफोर्मेंस के बाद जब ऑडियंस में से कोई आकर यह कहता है कि हम नही जानते कि दैवी और कृष्ण कैसे दिखते थे, मगर आपके जरिए हम इतना तो समझे कि शायद दैवी का यही रूप होगा और हम आपकी परफोर्मेंस के जरिए उनसे जुड सकें। तो मेरे लिए यब सबसे ज्यादा संतुष्टी वाला पल होता है।

एक डांसर के लिए रेगुलर प्रैक्टिस करना कितना जरूरी है?
बहुत जरूरी है... आप कितने ही प्रोफेशनल डांसर हो, कितने ही साल का तजुर्बा हो, मगर प्रतिदिन नियमित रूप से रियाज एक डांसर को डांस की कला से नियमित रूप से जोडे रखता है। मैं टेलीविजन सीरियलस कर रही हूं इसलिए मैं नियमित रूप से डांस को समय नही दे पाती, लेकिन जब भी समय मिलता है तो रियाज जरूर करती हूं। इसके अलावा डांस से जुड़े रहने के लिए महीने में चार-पांच शो भी जरूर करती हूँ।

इन दिनों टीवी पर आ रहे डांस रियलिटी शो के बारे में क्या कहेंगी?
कमाल के रियलिटी शोज आ रहे हैं। हम जैसे डांसर्स के लिए भी यह काफी अहम है क्योंकि हम लोग भी इनसे बहुत कुछ सीखते हैँ। जैसे कि अभी डीआईडी सुपर मॉम्स चल रहा है। उसमें उन महिलाओं को अपने सपने अब पूरे करने का मौका मिल रहा है जो किसी ना किसी परिस्थिति में पीछे छूट गए थे। ऐसी डांस रियलिटी शोज कितनी महिलाओं के सपने को एक बार फिर पंख लगाएगें?

नए डांसर को सामने लाने में इनकी क्या सार्थक भूमिका हो सकती है?
नए डांसर्स को ग्रुम करने में रियलिटी शोज का बहुत बड़ा हाथ है। शोज देश के कोने-कोने में छिपी हुई प्रतिभा को खोजते हैं, टेलेंट को मंच देते हैं, और देखते ही देखते वह सेलीब्रेटी बन जाते हैं।


इंडियन क्लासिकल डांस की बहुत समृद्ध परंपरा रही है, फिर आजकल यंगस्टर्स उनकी बजाए पॉपुलर फिल्मी या वेस्टर्न डांस को ज्यादा क्यों पसंद करते है?
यह तो कॉमर्शियलिटी है जिसकी वजह से यंगस्टर्स का रुझान पॉपुलर फिल्मी या वेस्टर्न डांस की ओर रूझान ज्यादा बढ़ रहा है। हम भी फिल्मी डांस करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि अगर आपका बेस क्लासिकल डांस का है तो आप डांस के किसी भी फॉर्म को आसानी से कर सकते हैँ। क्लासिकल डांसर के बदन में सेंस ऑफ रिदम, टाइमिंग, म्यूजिक सबकुछ होता है, इसीलिए आसानी से डांस की कोई भी फॉर्म एडोप्ट की जा सकती है। थोड़ी प्रोब्लम यह हो सकती है कि डांस फॉर्म को एडोप्ट करने में कुछ समय लगे। मगर ऐसा नही हो सकता है कि क्लासिकल डांसर कोई दूसरा फॉर्म ना कर सकें।

फिजिकली डिसेबल होने के बाद आपको अपनी मंजिल पाने के लिए किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा?
जब आप कुछ करना चाहते हो तो फिर डिसेबिलिटी हो या नॉन डिसेबिलिटी, इससे कोई फर्क नही पड़ा। बस आपका दिल और दिमाग बहुत स्ट्रोंग होना चाहिए। यदि आप टारगेट बनाकर अपने मंजिल पर आगे बढ़ेंगे तो समस्याएं तो आएंगी, मगर एक दिन मंजिल पर भी आप पहुंच ही जाएगेँ।

नृत्य के क्षेत्र में कैरियर बनाने वाले युवाओं को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
प्रोफेशनलिज्म बहुत ज्यादा जरूरी है। आजकल देखा-देखी करने की प्रोबल्म बहुत ज्यादा हो रही है। जैसे मेरी फ्रेंड डांसर बनेगी तो मैं भी बनूंगी आदि। यह नही होना चाहिए। आपकी कमिटमेंट बहुत जरूरी है। आज के डांसर्स तो बहुत ही लक्की है क्योंकि जब हमने डांस की शुरूआत की थी तो तब घर से पैसे लगाकर डांसर बना जाता था। लेकिन आज डांसिंग का क्षेत्र बिल्कुल बदल गया है। शुरूआती दौर में आप कही भी छोटे-छोटे प्रोग्राम में हिस्सा ले सकते हैं, वहां से भी कुछ ना कुछ जरूर मिलता है। अच्छे डांसर बन जाते हैं तो बहुत एक्सपोजर है, कोरियोग्राफर के भी रास्ते खुले है। डांस सीखने के बाद डांसिग इस्टीट्यूट खोलकर भी आप अपने प्रोफेशन को आगे बढ़ा सकते हैँ। पेरेंट्स को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए आज के समय में डांस प्रोफेशन के तौर पर बहुत ज्यादा प्रोफिटेबल है। वर्तमान में परिस्थितियां बदल चुकी है और आने वाले समय में डासिंग के फील्ड में बहुत स्कोप है। बशर्ते दिल से मेहनत करें।

फ्यूचर को किस तरह देखती हैं? 
मैं फ्यूचर को कभी प्लान नही करती है। मेरा मानना है कि यदि आप प्रजेंट को अच्छे से जी जाते हो तो फ्यूचर से डरने की जरूरत नही होती। मैं प्रजेंट पर पूरा फोकस करती हूँ।

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मुनव्वर राना साहब की जिंदगी के खट्टे-मिठे पल (interview of munawwar rana)


नवजात शिशु की पहली गुरु के साथ-साथ उसकी जीवनदाता होती है मां। मां शब्द को परिभाषित करना लगभग असंभव-सा है क्योंकि मां खुद में ही गागर में सागर जैसी होती है। लेकिन कुछेक लोग ऐसे भी है जिन्होंने मां को परिभाषित करने का प्रयास किया है। बात शायरी और गजल की करें तो शायरों की दुनिया में अकेले मुनव्वर राना ही ऐसे शायर है जिन्होंने अपनी गजल और शायरी से मां को संबोधित किया है और अपने इस प्रयास में सफल भी रहे। आज मुनव्वर एक जाने माने शायर है और विदेशों तक में मुशायरों में शरीक होने पहुंचते हैँ। मुनव्वर साहब ने हमारे साथ साझा किए जिंदगी के कुछ खट्टे मिठे पल-

गजल और शायरी में मां क्यों?

लगभग 40 साल पहले मां पर कहना शुरू किया था। उस जमाने में उर्दू गजल का मतलब होता था महबूब से बातें करना (शब्दकोशों में भी गजल का एक मतलब महबूब से बात करना होता है)। उर्दू गजल में महबूब की आंख, कान, बाल, कमर, खूबसूरती आदि की ही बातें होती थी। खुले गोश्त की दुकान जैसी हो गई थी उर्दू गजलें। तभी दिमाग में आया कि यदि एक मामूली शक्ल वाली औरत हमारी महबूबा हो सकती है तो हमारी मां हमारी महबूब क्यों नही हो सकती? मां हमारी प्रेमिका क्यों नही हो सकती? हम अपनी मां को इतना प्रेम क्यों नही कर सकते? जब तुलसीदास के महबूब भगवान राम हो सकते हैं तो मेरी महबूबा मेरी मां भी हो सकती है। उन दिनों दिमाग में बस यही सब चलता था और ऐसी ही मैंने मां पर शेर कहने शुरू किए। आलोचकों के निशाने पर भी खूब रहा। लेकिन मैं अपने रास्ते चलता रहा। कहा भी है-

चलती फिरती आँखों से अज़ाँ देखी है
मैंने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखि है

जो कुछ भी हूं मां की बदौलत हूं

शायरी के कंसेप्ट की बात हो या फिर किसी नए विचार की। मां ही थी जिससे मुझे यह सब मिला और मैं लिखते-लिखते यहां तक पहुंचा। मेरे शेरों में मां का बहुत बड़ा योगदान है।

मां का कर्ज उतारे नही उतर सका
जिस तरह एक मां अपने बच्चों को पालती है, परेशानी में रहते हुए भी अपने बच्चों पर आंच नही आने देती। बच्चों को अच्छी तालीम, संस्कार भी मां से ही मिलते हैँ। ऐसा जज्बा और किस रिश्ते में मिल सकता है? बच्चा बड़ा भी हो जाए तो भी मां उसके साथ साए की तरह रहना चाहती है। कभी उससे नाराज नही होती। इस पर मैंने एक शेर भी कहा था-

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

नसीबवाले है वो जिनके साथ मां रहती है
कल्चर बदल रहा है, शहरों में घर छोटे होते है, एकांकी परिवार हो रहे हैं, उस मां को जिसने जन्म दिया, को भी लोग गांव भेज देते हैं और भूल जाते हैं मां का कर्ज जोकि उतारे नही उतर सकता। मैं नसीबवाला हूं कि मां मेरी साथ रहती है।जिनके साथ मां रहती है समझों उनके साथ भगवान रहता है। मां ऐसी होती है कि उसका बच्चा कुछ भी गलत करें तो भी नाराज नही होती।

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

जब अम्मा ने समझाया था
वालिद साहब ने हमारा बीकाम में एडमिशन करा दिया। मगर बदमाशी करने के कारण क्लास में बहुत कम जाते थे। घर वालों को भी पता चल गया था। हमारे वालिद चाहते थे कि हम उनके ट्रासपोर्ट के काम में हाथ बटाए। उनका कानपुर में ट्रांसपोर्ट का छोटा सा कारोबार था। ट्रांसपोर्ट का काम बड़ा रफ-टफ होता है। हमारा उसमें मन नही लगता था। तो हमने भी कह दिया कि हमसे ट्रांसपोर्ट का काम नही हो सकता, आप चाहे तो हमें घर से निकाल दें। तब अम्मा ने समझाया था कि जंजाल अच्छा है संजाल अच्छा नही है। काम में हाथ नही बटाओगे तो खर्चे कहां से निकलेंगे। अब्बा-अम्मा तो पुराने पेड़ों की छाया की तरह होते हैं, इनका ख्याल भी तो तुम्हें ही रखना है। छोटे-भाई बहनों का ख्याल भी रखना है। अम्मा की बात दिमाग में आई और आखिरकार थक-हारकर ट्रांसपोर्ट के काम में हाथ बटाने लगे।

बच्चा कभी मां की नजरों में बुढ़ा नही होता
हमने अपनी पांचों बेटियों और एक बेटी की शादी कर दी। एक दिन ख्याल आया कि इंशा-अल्ला हमने अपने फर्ज अदा कर लिए है। किसी से कभी मांगना नही पड़ा, सबकुछ ठीकठाक हो गया। जिंदगी को भी अच्छे से बिताया। ये मां की दुआएं ही थी कि हमने अपनी जिंदगी इतनी शानदार तरीके से गुजारी। एक दिन मैंने मां को कहा कि मां अब मैं बूढ़ा हो रहा हूं तो मेरे रूकने से पहले ही मां ने जवाब दिया कि जिसकी मां जिंदा हो उसका बेटा बूढ़ा नही होता। बाद में मैंने एक शेर भी कहा था-

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

मुनव्वर राना फिलहाल बिमार है। बोला नही जा रहा था, लेकिन जैसे-जैसे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो मानों उन्हें अपने दर्द का एहसास भी खत्म सा हो गया। मां आएशा खातून का जहां भी जिक्र आता, वही उनका शुक्रियादा करना नही भूले। कहते हैं मां 82 साल की हो गई है मगर अभी भी सोचता हूं कि बच्चा बनकर मां से लिपट जांऊ। इसी से पता चलता है उनका मां के प्रति प्रेम और लगन। बातचीत के बाद जब उन्हें कहा गया कि आपके जल्द से जल्द स्वस्थ्य होने की प्रार्थना करता हूं तो भी चलते-चलते एक शेर यह कह गए-

अभी जिंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नही होगा
मैं घर से जब निकलता हूं, दुआ भी साथ चलती है